अध्याय 16: दैवासुर संपद विभाग योग

दैवासुर संपद विभाग योग श्रीमद्भगवद्गीता का सोलहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण मनुष्य के भीतर उपस्थित दैवी (सत्कर्म) और आसुरी (दुष्कर्म) गुणों का स्पष्ट वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि दैवी गुण जैसे निडरता, सत्य, अहिंसा, संयम और करुणा मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की ओर ले जाते हैं। वहीं आसुरी गुण जैसे अहंकार, क्रोध, लोभ और अज्ञान व्यक्ति को अधोगति और दुखों की ओर ले जाते हैं। इस अध्याय में भगवान यह भी समझाते हैं कि मनुष्य को शास्त्रों के अनुसार जीवन जीना चाहिए और दैवी गुणों को अपनाकर अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाना चाहिए। यह अध्याय सही और गलत के बीच अंतर समझाकर जीवन को सही दिशा देने की प्रेरणा देता है।

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