अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग श्रीमद्भगवद्गीता का तेरहवाँ अध्याय है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) के बीच के अंतर को गहराई से समझाते हैं। वे बताते हैं कि यह शरीर एक क्षेत्र की तरह है, जिसमें विभिन्न विकार और परिवर्तन होते हैं, जबकि आत्मा उस क्षेत्र का ज्ञाता है और सदा अचल एवं शुद्ध रहती है। इस अध्याय में प्रकृति और पुरुष के संबंध, ज्ञान के तत्व और अज्ञान के प्रभाव का भी विस्तार से वर्णन किया गया है। भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि सच्चा ज्ञान वही है, जो मनुष्य को आत्मा और परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने में सहायता करता है, जिससे वह मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।

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