दही दूंगी रे साँवरिया थोड़ी बँसुरी बजा भजन
दही दूंगी रे सांवरिया, जरा मुरली तो बजा।
मुरली तो बजा, ओ कान्हा! मधुर तान सुना।
दही दूंगी रे सांवरिया, जरा मुरली तो बजा॥
ऐसी बजा जो बागों के हर, फूल को महका दे,
सुनकर जिसे मालिनी भी, अपनी सुध-बुध विसरा दे।
उपवन की हर कोयल भी, बस कूक-कूक रह जाए,
दही दूंगी रे सांवरिया, जरा मुरली तो बजा॥
मुरली तो बजा, ओ कान्हा! मधुर तान सुना।
दही दूंगी रे सांवरिया, जरा मुरली तो बजा॥
ऐसी बजा जो जमुना के उस शीतल तट पर छाई थी,
मृदु स्वर सुन उस धोबिन ने भी सुध अपनी बिसराई थी।
कल-कल बहता जमुना जल भी थमता-थमता जाए
दही दूंगी रे सांवरिया, जरा मुरली तो बजा॥
मुरली तो बजा, ओ कान्हा! मधुर तान सुना।
दही दूंगी रे सांवरिया, जरा मुरली तो बजा॥
ऐसी बजा जो बंसीवट पर तुमने कभी बजाई थी,
प्रेम-मगन हो सखियों ने भी सुध अपनी गँवाई थी।
ब्रज की हर इक गोपी का मन हँस-हँस के मुस्काए
दही दूंगी रे सांवरिया, जरा मुरली तो बजा॥
मुरली तो बजा, ओ कान्हा! मधुर तान सुना।
दही दूंगी रे सांवरिया, जरा मुरली तो बजा॥
ऐसी बजा जो मधुबन में सब ग्वालों को सुनाई थी,
जिसकी धुन पर कुंज-गली में हरियाली मुस्काई थी।
ब्रज की पावन माटी का कण हर्षित होता जाए
दही दूंगी रे सांवरिया, जरा मुरली तो बजा॥
मुरली तो बजा, ओ कान्हा! मधुर तान सुना।
दही दूंगी रे सांवरिया, जरा मुरली तो बजा॥
ऐसी बजा जो वृंदावन की हर कुटिया में गूँजी थी,
गोकुल के हर नर-नारी की वह ही पावन पूँजी थी।
सुनकर तेरी वंशी का स्वर जग ये विसर जाए
दही दूंगी रे सांवरिया, जरा मुरली तो बजा॥
मुरली तो बजा, ओ कान्हा! मधुर तान सुना।
दही दूंगी रे सांवरिया, जरा मुरली तो बजा॥
ऐसी बजा जो निधिवन में जब रास रचाई थी
सुनकर जिसकी तान राधिका दौड़ी-दौड़ी आई थी।
बरसाने की लाली का दिल तुझमें ही लग जाए,
दही दूंगी रे सांवरिया जरा मुरली तो बजा॥
मुरली तो बजा, ओ कान्हा! मधुर तान सुना।
दही दूंगी रे सांवरिया, जरा मुरली तो बजा॥